ताड़ोबा के संरक्षण के लिए एक ओर जहां करोड़ों का धन सरकार पानी की तरह बहा रही हैं, वहीं दूसरी ओर ताड़ोबा के कोर व बफर जोन से सटे इलाकों में मौजूद 60 हजार पेड़ों को काटने की तैयारियां चल रही है। यहां दुर्गापुर कोल माइन के विस्तारीकरण की परियोजना को साकार करने का प्रयास किया जा रहा है। परंतु इसके खिलाफ अब पर्यावरणवादी अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं। विस्तारीकरण के विरोध में मामला अब हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है। न्यायालय के फैसले का सभी को इंतजार है।
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चंद्रपुर के पास स्थित दुर्गापुर कोल माइन के विस्तार के खिलाफ प्रकृति फाउंडेशन के अध्यक्ष दीपक दीक्षित ने मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर की है। उन्होंने पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की दलील देते हुए इस परियोजना को रद्द करने की मांग की है।
वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (वेकोली) की दुर्गापुर खदान का विस्तार लगभग 121.58 हेक्टेयर वन भूमि पर प्रस्तावित है, जिसे मंजूरी मिल चुकी है। लेकिन इस निर्णय से पहले इस परियोजना के पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव का गहन अध्ययन नहीं किया गया। जिस वन भूमि पर यह विस्तार होगा, वह बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे कई वन्यजीवों का निवास स्थान है। यह क्षेत्र ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र से 12 किलोमीटर और बफर क्षेत्र से सिर्फ 1.25 किलोमीटर दूर है। विस्तार से लगभग 60,000 पेड़ काटे जाएंगे, जिससे वन्यजीवों का आवास प्रभावित होगा। इसका परिणाम मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि हो सकता है, क्योंकि ये वन्यजीव शहरों की ओर पलायन करेंगे। यह क्षेत्र पहले से ही काफी संवेदनशील है।
यह मौलिक अधिकारों का हनन
संविधान के तहत नागरिकों को जीने का मौलिक अधिकार दिया गया है, जिसमें स्वच्छ वायु और पानी का अधिकार भी शामिल है। हालांकि, वेकोली की कोल माइनिंग गतिविधियों के कारण चंद्रपुर जिले के नागरिकों का जीवन कठिन हो गया है। कोयले की धूल से वायु और जल प्रदूषण हो रहा है, जिससे नागरिक विभिन्न गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। इसी कारण पर्यावरण संरक्षण के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता पर याचिकाकर्ता ने जोर दिया है।
20 नवंबर को होगी सुनवाई
इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 20 नवंबर को होगी। याचिका में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव, वेकोली, राज्य के राजस्व और वन विभाग के सचिव, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के सदस्य सचिव और चंद्रपुर जिलाधिकारी को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट महेश धात्रक मामले का नेतृत्व करेंगे।
नष्ट होगा वन्यजीवों का अधिवास
इस मुद्दे पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि खदानों के विस्तार से क्षेत्र में न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है, बल्कि स्थानीय वन्यजीवों के आवास भी नष्ट होते हैं। इससे न केवल वन्यजीवों को संकट का सामना करना पड़ता है, बल्कि आसपास के मानव समुदायों को भी संघर्ष का सामना करना पड़ता है। इस विस्तार से स्थानीय वायु और जल प्रदूषण में वृद्धि होगी, जिसका सीधा प्रभाव स्थानीय स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
वन क्षेत्रों के इस तरह के बड़े पैमाने पर क्षरण से मानव-प्रकृति संबंध और अधिक जटिल होते जाएंगे, जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।