भारत में शाहजहाँ ने मुमताज के लिये ताज महल बनाया सभी को पता है पर एक गोंड रानी हिराई आत्राम ने अपने पति की याद में भव्य समाधी बनायीं यह किसी को नहीं पता है।
Rani Hirai A Symbol of Love in Chandrapur: चंद्रपुर में प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले गोंडराजा बीरशाह और उनकी पत्नी रानी हिराई की स्मृति में इको-प्रो संस्था और एफईएस कॉलेज के छात्रों ने उनकी समाधि पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। ‘सलाम रानी हिराई’ नामक इस विशेष कार्यक्रम में सैकड़ों छात्रों ने भाग लिया और रानी हिराई के अमर प्रेम और उनके कर्तव्यों को याद किया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को क्षणिक प्रेम और आधुनिक प्रेम-प्रदर्शन से दूर रहकर, सच्चे प्रेम और निष्ठा को अपनाने की प्रेरणा देना था। यह आयोजन प्रेम दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया, ताकि युवा पीढ़ी अपने संबंधों में प्रेम की गहराई और निष्ठा को महत्व दें। हर वर्ष गोंडराजा बीरशाह और रानी हिराई की समाधि स्थल पर इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
रानी हिराई: प्रेम और समर्पण की प्रतीक
गोंडराजा बीरशाह की मृत्यु के बाद, रानी हिराई ने उनकी स्मृति में एक भव्य स्मारक का निर्माण कराया। यह स्मारक सुंदरता और भव्यता में किसी भी ऐतिहासिक इमारत से कम नहीं है। कहा जाता है कि रानी हिराई ने पहले इस इमारत की प्रतिकृति एक ही पत्थर में उकेरकर बनवाई थी, जो आज भी नागपुर के मध्यवर्ती संग्रहालय में संरक्षित है। इसके बाद उन्होंने इस वास्तुशिल्पीय चमत्कार का निर्माण करवाया।
ताजमहल की तरह, यह भी एक प्रेम की निशानी है, जिसे रानी हिराई ने अपने दिवंगत पति के लिए बनवाया था। हालांकि, केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि रानी हिराई ने राज्य के प्रशासन की भी जिम्मेदारी संभाली और अपने कुशल नेतृत्व से कई विकास कार्य किए। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व क्षमता आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकती है।
इतिहास को जीवंत रखने का प्रयास
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि चंद्रपुर की यह प्राचीन वास्तुकला हमारे ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है। प्राध्यापकों ने कहा कि रानी हिराई ने अपने कार्यों और प्रेम के माध्यम से गोंडराजा बीरशाह के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण को अमर कर दिया।
इको-प्रो के प्रमुख बंडू धोतरे ने कहा, “रानी हिराई और राजा बीरशाह का प्रेम कालजयी है। उनके कार्यों और योगदान के कारण वे आज भी जीवंत हैं। युवा पीढ़ी को ऐसे ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कर इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें अपने रिश्तों में स्थायित्व और सच्चाई बनाए रखने की सीख लेनी चाहिए, न कि केवल एक दिन के प्रेम प्रदर्शन तक इसे सीमित रखना चाहिए।”
कार्यक्रम का आयोजन और प्रमुख वक्ता
इस कार्यक्रम का संचालन प्रो. डॉ. राजेंद्र बारसागडे ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. डॉ. मेघमाला मेश्राम ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इको-प्रो के प्रमुख बंडू धोतरे ने की।
इस दौरान उपस्थित प्रमुख मार्गदर्शक थे: प्रभारी प्राचार्य डॉ. राजेश चिमनकर, प्रो. डॉ. करुणा करकाड़े, प्रो. सावधान उमक
इसके अलावा विभिन्न प्राध्यापक, इको-प्रो के सदस्य और सैकड़ों विद्यार्थी भी इस आयोजन का हिस्सा बने। कार्यक्रम की सफलता में राजू काहिलकर, सुनील पाटील, सचिन धोतरे, सनी दुर्गे और चित्राक्ष धोतरे का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
ऐतिहासिक धरोहर से प्रेरणा लेने की जरूरत
‘सलाम रानी हिराई’ जैसे आयोजनों का महत्व केवल इतिहास को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युवा पीढ़ी को अपने रिश्तों और समाज में प्रेम, निष्ठा और कर्तव्य का सही अर्थ समझाने का एक प्रयास है।
रानी हिराई ने अपने प्रेम को केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे वास्तुशिल्प, नेतृत्व और विकास कार्यों में रूपांतरित किया। यह संदेश आज के युवाओं के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जो क्षणिक प्रेम में उलझने के बजाय, अपने रिश्तों को सच्चाई और स्थिरता के साथ जी सकते हैं।
इस तरह के आयोजन इतिहास से जुड़े रहने और उनसे सीख लेने की प्रेरणा देते हैं, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव आ सके
इतिहास: रानी हिराई आत्राम
दक्षिण गोंडवाना साम्राज्य का विशाल साम्राज्य कन्हान नदी, आभोर के संगम, पवनार – वर्धा के संगम तथा गोदवरी- इंद्रावती पामल गौतमी परलकोट अंधरी मूल नदियों के संगम झरपट- इराई नदी के संगम में बसा अनेक किल्लो का चांदागढ़ राज्य था । ये पुरातत्व के एक धरोहर है।
अपने पति राजा विर शाह के मरणोपरांत सन् 1704 से लगभग 15 साल महारानी हिराई ने गोंडवाना साम्राज्य की बागडोर संभाली। एक सशक्त महिला शासक के रूप में उनका कार्यकाल याद किया जाता है। महारानी हिराई ने अनेक लोकोपयोगी कार्य किये। उन्होंने आत्राम राजवंश के पूरखों के समाधी, राजा विर शाह की समाधी स्थल, कई किले, महल, तोपें, तालाब, घाट, नहर, बाजार हाट आदि बनवाए। शिक्षा, कला-संगीत को बढ़ावा दिया | महारानी हिरई ने स्वर्ण, चाँदी और तांबे के सिक्के चलवाए। प्रजा स्वर्ण मुद्रा में लगान देती थी।
रानी हिराई ने अनेक जनकल्याण कार्य कराये। ताडोबा के जंगल में वन्य प्राणियों के लिए ताडोबा का तालाब बनवाया । घोडादेहि का तालाब जंगलों में वन्य प्राणियों के लिया पानी और पक्षी विहार करने के लिया जल विहार बनवाई थी। वर्धा, वेनगंगा, इराईनदी, झरपट नदी में घाट तथा नावों से लोग नदी पर करते रहते थे। संपूर्ण राज्यों के किलो में “हाथी पर शेर” के पत्थर के राज्य चिन्ह बने थे। रानी हिरई अपने मुद्रा चांदागढ़ के पूर्व में खाडक्या बल्लारशाह के स्वर्ण, चाँदी और तांबे के सिक्के चलते थे। जो दूसरे राज्यों में भी उन सिक्कों का मूल्य थे पूतरि 2 तोला का एव 1 तोला का मुद्रा का प्रचलित था।
अपनी 15 वर्ष की शासनकाल राज्य की सुरक्षा समृद्धि और भावी राजा गोदपुत्र को बीस वर्ष के आयु तक अच्छे शासक बने के लिया सभी योग्यताओं से शिक्षित किया और ई सन 1719 में रानी ने पुत्र को राज गद्दी सौप दीं। इसके पुत्र राम शाह को चांदागढ़ की किलों की चांदा में फांदा की राजनीती को अच्छे तरह से प्रशिक्षित किया। सन् 1728 में 65 वर्ष की आई में लिंगोवासी हो गयी। राजा विर शाह के समाधी स्थल के पास ही रानी हिराई की समाधी है। उनके प्रेम की यादगार में गोंडवाना में अजर अमर हो गया।
महारानी हिराई का राज्य काल मुग़ल सल्तनत, मराठा, बहमनी, सुल्तान और अपने ही निज परिवार से जीवन भर युद्ध संघर्ष करते बिता। उन्होंने अपने शासनकाल में 16 युद्ध लड़ा और सभी को जीता। फिर भी वह एक ऐसी लौह गोंड रानी जैसे धीरवीर अदम्य उत्साही योद्धा की तरह लड़ती रहीं। अपने 15 वर्ष की शासनकाल राज्य की सुरक्षा, समृद्धि एवं खुशहाली के साथ अनेक सुधर कार्य करते हुए समय बिताया।
