चंद्रपुर में करारी हार के बाद BJP में खुला अंतर्विरोध, मंत्रीपद को लेकर मुनगंटीवार–अहीर–जोरगेवार आमने-सामने
चंद्रपुर जिले में स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए हैं। चुनावी पराजय के कारणों को लेकर वरिष्ठ नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी तेज हो गई है। सुधीर मुनगंटीवार, हंसराज अहीर और किशोर जोरगेवार के बीच मंत्रीपद, संगठन और चुनावी रणनीति को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है।
मुनगंटीवार का आरोप: पूर्व विदर्भ की उपेक्षा से बिगड़ा समीकरण
आमदार सुधीर मुनगंटीवार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा नेतृत्व ने पूर्व विदर्भ—चंद्रपुर, गडचिरोली, भंडारा और गोंदिया—को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं दिया। उनका कहना है कि “दरवाजे खोलकर बाहरी नेताओं (आयाराम-गयाराम) को शामिल किया गया, जबकि क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और जनभावनाओं की अनदेखी हुई। यही कारण है कि नगरपालिका चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा।”
मुनगंटीवार ने यह भी जोड़ा कि कांग्रेस ने अपने नेतृत्व ढांचे में विजय वडेट्टीवार को राज्यस्तरीय जिम्मेदारी दी, जबकि भाजपा में पूर्व विदर्भ हाशिये पर रहा।
अहीर का पलटवार: मंत्रीपद और जीत का सीधा संबंध नहीं
मुनगंटीवार के आरोपों पर पूर्व केंद्रीय मंत्री हंसराज अहीर ने जवाब देते हुए कहा कि मंत्रीपद और चुनावी जीत का कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 1996 में कांग्रेस के शांताराम पोटदुखे केंद्रीय मंत्री थे, फिर भी उन्हें लोकसभा चुनाव में पराजय मिली। वहीं 2019 में स्वयं मंत्री रहते हुए वे चुनाव हार गए।
अहीर ने नगरपालिका चुनाव में हार स्वीकार करते हुए कहा, “इस पराजय से सबक लिया जाएगा, लेकिन हर बात को मंत्रीपद से जोड़ना सही नहीं।”
जोरगेवार का तंज: हार-जीत कार्यकर्ताओं के परिश्रम से तय होती है
इस विवाद में आमदार किशोर जोरगेवार ने भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि मंत्रीपद को हार-जीत का पैमाना बनाना उन लाखों कार्यकर्ताओं का अपमान है जिन्होंने समर्पित भाव से काम किया। जोरगेवार ने यह भी याद दिलाया कि मंत्री रहते हुए भी लोकसभा और अन्य चुनावों में पराजय हुई है, जबकि बिना मंत्री वाले जिलों में भाजपा ने जीत दर्ज की है।
घुग्घुस और राजुरा: जमीनी राजनीति ने बदले नतीजे
चुनावी नतीजों ने यह भी दिखाया कि जमीनी स्तर पर गठजोड़ और बगावत ने बड़ा असर डाला। घुग्घुस में भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन मतदाताओं ने कांग्रेस के नगराध्यक्ष प्रत्याशी को चुना—वह भी पार्टी के भीतर बगावत के बावजूद।
राजुरा में पहली बार विधायक बने भाजपा नेता देवराव भोंगले के लिए भी यह आत्ममंथन का क्षण है। यहां कांग्रेस के सुभाष धोटे और शेतकरी संगठन के एड. वामनराव चटप की एकजुटता ने भाजपा के समीकरण ध्वस्त कर दिए। चटप ने अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार कांग्रेस का साथ दिया और गड़वांदुर में निर्दलीय प्रत्याशी नीलेश ताजने की जीत आसान की।
संगठन बनाम नेतृत्व, संदेश साफ
चंद्रपुर के नतीजों ने भाजपा के सामने स्पष्ट संदेश रखा है—स्थानीय नेतृत्व, क्षेत्रीय संतुलन और संगठनात्मक अनुशासन के बिना चुनावी सफलता मुश्किल है। मंत्रीपद की बहस से आगे बढ़कर जमीनी कार्यकर्ताओं, स्थानीय मुद्दों और विश्वसनीय उम्मीदवारों पर फोकस करना ही पार्टी के लिए आगे का रास्ता तय करेगा।
