चंद्रपुर शहर में इन दिनों ‘अम्मा चौक’ नामकरण को लेकर घमासान मचा हुआ है। दलित, कष्टकरी महिला द्वारा गरीबों के लिए शुरू की गई ‘अम्मा टिफिन’ योजना की प्रेरणादायक पहल को देखते हुए पादपथ असोसिएशन ने चौराहे का नाम ‘अम्मा चौक’ रखने की मांग महापालिके से की थी। महापालिके ने इस मांग को स्वीकार करते हुए फरवरी महीने में नामकरण का निर्णय भी ले लिया।
हालांकि, अब इस फैसले का तीखा विरोध कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और पिरिपा (पीपल्स रिपब्लिकन पार्टी) जैसे विपक्षी दलों द्वारा किया जा रहा है। इन दलों का आरोप है कि भाजपा विधायक किशोर जोरगेवार इस नामकरण के बहाने दीक्षाभूमि जैसे पवित्र स्थान पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
AAP जिलाध्यक्ष मयूर राईकवार और पिरिपा नेता अनिल रामटेके ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विधायक जोरगेवार द्वारा शुरू किया गया ‘अम्मा की पढ़ाई’ उपक्रम सिर्फ एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि दीक्षाभूमि क्षेत्र को कब्जे में लेने की रणनीति का हिस्सा है।
विधायक जोरगेवार का पलटवार:
इन सभी आरोपों का जवाब देते हुए भाजपा विधायक किशोर जोरगेवार ने पत्रकार परिषद में कहा:
> “‘अम्मा चौक’ नामकरण की मांग मेरी नहीं, बल्कि पादपथ असोसिएशन की थी। मुझे इस नामकरण को लेकर कोई व्यक्तिगत आग्रह नहीं है। यदि नाम देने से ‘अम्मा’ बड़ी बनती हैं या न देने से छोटी, ऐसा कुछ नहीं। महापालिका स्वतंत्र है—उसे जैसा उचित लगे, वैसा निर्णय ले।”
उन्होंने आगे कहा कि ‘देवाभाऊ जनकल्याण सेवा सप्ताह’ की अभूतपूर्व सफलता कुछ लोगों को रास नहीं आई। इसलिए विरोध के पीछे कुछ तथाकथित कांग्रेस नेताओं को मोहरा बनाया गया है।
‘अम्मा की पढ़ाई’ पर उठे सवाल:
विधायक जोरगेवार ने ‘अम्मा की पढ़ाई’ उपक्रम को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की शिक्षा और सामाजिक चेतना के सिद्धांतों से प्रेरित बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उपक्रम गरीब विद्यार्थियों को पढ़ाई के अवसर देने हेतु शुरू किया गया है, और इसमें कोई छुपा एजेंडा नहीं है।
> “हमें सामाजिक सेवा का संस्कार अम्मा से ही मिला है। उसी भावना से ये सारे उपक्रम चल रहे हैं।” – विधायक जोरगेवार
राजनीति के केंद्र में ‘अम्मा’:
नामकरण से लेकर दीक्षाभूमि के मुद्दे तक, इस पूरे विवाद के केंद्र में एक महिला की संघर्षमयी कहानी और उनके नाम से जुड़े प्रतीक बन चुके ‘अम्मा’ हैं। भाजपा इसे गरीबों और दलितों के सम्मान से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता पक्ष की राजनीतिक बिसात का हिस्सा मान रहा है।
‘अम्मा चौक’ का मुद्दा अब सिर्फ एक नामकरण का विषय नहीं रहा। यह दलित राजनीति, प्रतीकात्मक दावेदारी और सामाजिक योजनाओं की राजनीतिक ब्रांडिंग का संग्राम बन चुका है। जहां भाजपा इसे सामाजिक कार्य के रूप में प्रचारित कर रही है, वहीं विपक्ष इसे आगामी चुनावों से पहले की जमीन तैयार करने की चाल मान रहा है।
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