चंद्रपुर महानगरपालिका और घुग्घुस नगर परिषद में कांग्रेस की राजनीति इन दिनों तीखे सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक पोस्ट ने कांग्रेस संगठन के भीतर चल रही उस राजनीति को उजागर किया है, जिसमें चुनाव जीतने के बाद भी निर्वाचित प्रतिनिधियों को सत्ता के वास्तविक निर्णयों से दूर रखा जा रहा है। सवाल यह है कि जब कांग्रेस बहुमत से जीतती है, तो फिर उपाध्यक्ष और अन्य अहम पद दूसरे दलों को क्यों सौंपे जाते हैं?
घुग्घुस नगर की राजनीति इन दिनों केवल नगरपरिषद के गलियारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया के मंच पर खुलकर बहस का विषय बन चुकी है। कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद सत्ता गठन में हो रही देरी और कुछ फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों ने पार्टी के भीतर गहरे असंतोष को जन्म दिया है। वायरल हो रही एक विश्लेषणात्मक पोस्ट ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति, गुटबाजी और कथित ‘मैनेजमेंट पॉलिटिक्स’ को सार्वजनिक बहस में ला खड़ा किया है।
घुग्घुस की राजनीति में मंगलवार को उस वक्त ज़बरदस्त हलचल मच गई, जब कांग्रेस के नवनियुक्त नगरसेवकों ने सामूहिक इस्तीफे का संकेत दे दिया। नगरपरिषद चुनाव में नगराध्यक्ष सहित 11 नगरसेवक चुनकर आने और दो निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद, सत्ता समीकरण को उलटने की कथित साज़िश ने पार्टी को भीतर से झकझोर दिया है।
बहुमत होते हुए भी उपाध्यक्ष पद पर ‘पराया’ चेहरा!
सूत्रों के मुताबिक, अजित पवार गुट से जुड़े एक नेता को उपाध्यक्ष बनाने के लिए कांग्रेस के ही कुछ प्रभावशाली नेता पार्टी-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त बताए जा रहे हैं। आरोप है कि 14 नगरसेवकों के मजबूत गुट को तोड़ने की सोची-समझी रणनीति के तहत विरोधी दल के नगरसेवक को उपाध्यक्ष बनाने की पटकथा रची गई।
कांग्रेस बड़े नेता और स्थानीय चेहरे पर गंभीर आरोप
कांग्रेस खेमे का दावा है कि इस पूरी कवायद के पीछे एक बड़े कद का नेता और घुग्घुस का एक स्थानीय नेता और वर्तमान नगरसेवक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। आरोप यहां तक हैं कि लोकतंत्र को ठेंगा दिखाते हुए धमकियां दी जा रही हैं—
“उपाध्यक्ष नहीं बनाया तो उठा लिया जाएगा”—
जैसे शब्दों ने सियासी मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कार्यकर्ताओं के साथ ‘विश्वासघात’ का आरोप
जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक पार्टी को खड़ा किया, हर चुनाव में कांग्रेस को मज़बूत जनसमर्थन दिलाया—उन्हीं को हाशिये पर धकेलने का कुटिल प्रयास होने का आरोप लगाया जा रहा है। नगरसेवकों का कहना है कि मतदाताओं के विश्वास के साथ विश्वासघात किया जा रहा है।
कल होगी प्रेस कॉन्फ्रेंस, होगा ‘भंडाफोड़’
कांग्रेस नगरसेवकों ने ऐलान किया है कि बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर वे
गुट तोड़ने की साज़िश,
पार्टी-विरोधी गतिविधियों,
और पर्दे के पीछे सक्रिय चेहरों
का खुलासा करेंगे।
जनता से माफी, फिर इस्तीफा!
सूत्र बताते हैं कि नगरसेवक जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए नगरसेवक पद से इस्तीफा सौंपने का फैसला ले सकते हैं। उनका तर्क साफ है—जब जनादेश का सम्मान नहीं, तो पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार भी नहीं।
घुग्घुस की यह लड़ाई केवल पद और कुर्सी की नहीं, बल्कि लोकतंत्र, जनादेश और पार्टी की आत्मा की है। यदि बहुमत के बावजूद कांग्रेस अपने ही घर में बिखरती है, तो इसका असर न सिर्फ नगरपरिषद बल्कि जिले की राजनीति पर भी दूरगामी होगा।
अब निगाहें आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर टिकी हैं—
क्या सच सामने आएगा या सियासी धुंध और गहरी होगी?
‘डरो मत’ बनाम जमीनी हकीकत
एक ओर कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी लगातार “डरो मत” का संदेश देते हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर कांग्रेस के ही जनप्रतिनिधि दबाव की राजनीति के आगे असहाय नजर आ रहे हैं। यह विरोधाभास पार्टी के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
घुग्घुस नगर परिषद की मौजूदा स्थिति केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि चंद्रपुर जिले में कांग्रेस की संगठनात्मक सेहत पर बड़ा सवाल है। बहुमत के बावजूद सत्ता पर कमजोर पकड़ यदि यूं ही बनी रही, तो इसका असर आने वाले चुनावों में पार्टी को भारी पड़ सकता है।
