दस वर्ष बाद हो रहे चुनाव में अचानक स्थगन से उम्मीदवारों में निराशा; ग़रीब प्रत्याशी मानसिक रूप से टूटे, चुनाव आयोग पर अन्याय का आरोप
घुग्घूस नगरपरिषद के चुनाव दस वर्षों बाद पहली बार आयोजित होने जा रहे थे, जिससे पूरे शहर में अभूतपूर्व उत्साह का माहौल था। विभिन्न राजनीतिक दलों और अपक्ष उम्मीदवारों ने पूरे जोश के साथ प्रचार अभियान शुरू किया था। शहर में जगह–जगह सभाएँ, रैलियाँ और जनसंपर्क गतिविधियाँ तेज़ी से चल रही थीं।
इसी बीच, 02 दिसंबर 2025 को होने वाले मतदान से ठीक एक दिन पहले चुनाव प्रक्रिया को अचानक स्थगित कर दिया गया। इस अप्रत्याशित निर्णय ने उम्मीदवारों को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक रूप से भी झकझोर कर रख दिया।
चुनाव स्थगन से भारी आर्थिक झटका
नामांकन प्रक्रिया से लेकर अंतिम दिन तक सभी उम्मीदवारों ने व्यापक प्रचार अभियान चलाया।
पोस्टर, बैनर, वाहन भाड़े, प्रचार दल, जनसंपर्क—इन सब पर प्रत्याशियों ने काफी धन खर्च किया था।
- चुनाव रुकने के कारण
अधिकतर उम्मीदवारों का पूरा चुनावी बजट समाप्त हो चुका है।
ग़रीब तबके से आने वाले कई उम्मीदवार मानसिक आघात झेल रहे हैं।
अब नई तारीख 20 दिसंबर 2025 घोषित की गई है, परंतु उम्मीदवारों के सामने आर्थिक संकट गंभीर बना हुआ है।
कई दावेदारों ने कहा कि उनके पास अब दोबारा चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक धनराशि तक उपलब्ध नहीं है, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी पर प्रभाव पड़ सकता है।
राजुरेड्डी ने आयोग पर लगाया सवाल — “निर्वाचन स्थगन अनुचित, लोकतंत्र के लिए हानिकारक”
कांग्रेस पार्टी के शहराध्यक्ष राजुरेड्डी ने चुनाव आयोग के निर्णय की कड़ी आलोचना की है।
उनका कहना है कि: “चुनाव स्थगित करने के लिए कोई ठोस कारण नहीं था। यह कदम एक सुनियोजित साज़िश जैसा प्रतीत होता है, जिसने उम्मीदवारों और मतदाताओं दोनों का चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास डगमगा दिया है। यह लोकतंत्र के लिए घातक है।”
उन्होंने आगे कहा कि: चुनाव की पूर्व-संध्या पर अचानक कार्यक्रम रुक जाना उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन है। खर्च हो चुकी रकम की क्षतिपूर्ति चुनाव आयोग को करनी चाहिए। 02 दिसंबर तक किए गए खर्च को उम्मीदवारों के आधिकारिक चुनावी खर्च में शामिल न किया जाए।
राजुरेड्डी ने विशेष रूप से यह भी कहा कि गरीब और सामान्य वर्ग के उम्मीदवार पूरी तरह टूट चुके हैं और उन्हें आर्थिक व मानसिक सहारे की तत्काल आवश्यकता है।
उम्मीदवारों में रोष और अनिश्चितता
चुनाव स्थगन की घोषणा ने शहर में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी है।
उम्मीदवारों का कहना है कि: वे फिर से प्रचार कैसे करेंगे, यह सबसे बड़ा प्रश्न है।मतदाताओं में भ्रम और असंतोष बढ़ रहा है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का भी कहना है कि बार-बार की अनिश्चितता से नगरपरिषद गठन में और देरी हो रही है, जिससे शहर के विकास कार्य प्रभावित होते जा रहे हैं।
घुग्घूस नगरपरिषद चुनाव स्थगन ने राजनीति, प्रशासन और आम जनता तीनों को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है।
चुनाव आयोग की ओर से पारदर्शिता तथा उम्मीदवारों के हित में स्पष्ट कदम उठाने की मांग तेज़ी से बढ़ रही है।
राजुरेड्डी द्वारा उठाए गए सवाल अब शहर की मुख्य राजनीतिक चर्चा का विषय बन गए हैं —
क्या आयोग चुनावी खर्च की भरपाई करेगा और क्या 20 दिसंबर की तारीख पर चुनाव सुचारु रूप से हो पाएंगे?
